मैं क्यों प्यार किया करता हूँ।
मैं क्यों प्यार किया करता हूँ! सर्वस देकर मौन रुदन का क्यों व्यापार किया करता हूँ ?
भूल सकूँ जग की दुर्घातें उसकी स्मृति में खोकर ही, जीवन का कल्मष धो डालूँ अपने नयनों से रोकर ही, इसीलिए तो उर-अरमानों को मैं छार किया करता हूँ। मैं क्यों प्यार किया करता हूँ !
कहता जग पागल मुझसे पर पागलपन मेरा मधु प्याला, अनु-धार है मेरी मदिरा उर-ज्वाला मेरी मधुशाला, इससे जग की मधुशाला का मैं परिहार किया करता हूँ। मैं क्यों प्यार किया करता हूँ !
करले जग मुझसे मन की पर मैं अपनेपन में दीवाना, चिंता करता नहीं दुःखों की मैं जलने वाला परवाना, अरे ! इसी से सारपूर्ण-जीवन निस्सार किया करता हूँ। मैं क्यों प्यार किया करता हूँ!
उसके बंधन में बंधकर ही दो क्षण जीवन का सुख पालूँ, और न उच्छृंखल हो पाऊँ मानस-सागर को मथ डालूँ, इसीलिए तो प्रणय-बंधनों का सत्कार किया करता हूँ! मैं क्यों प्यार किया करता हूँ !

